शक्तिपीठों की उत्पत्ति: सती के त्याग से शिव की तांडव तक

Sanjay Bajpai
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सती की अमर कथा: प्रेम, बलिदान और शिव का तांडव

लेखक: संजय बाजपेई | प्रकाशित: 2025


धार्मिक कथाओं में सती और शिव की कहानी एक ऐसी गाथा है जो प्रेम, त्याग, और ब्रह्मांडीय शक्ति के रहस्यों से ओतप्रोत है। यह कथा न केवल एक विवाह की त्रासदी को दर्शाती है, बल्कि देवताओं के अहंकार, पश्चाताप और पुनर्जन्म की गहराइयों को भी उजागर करती है।

                     🕉️ दक्ष का यज्ञ और शिव का अपमान

सती, भगवान शिव की पत्नी और ब्रह्मा की मानस पुत्री थीं। उन्होंने प्रेमवश शिव से विवाह किया, परंतु उनके पिता राजा दक्ष इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे। जब उन्होंने एक भव्य यज्ञ (हवन) का आयोजन किया, तो जानबूझकर शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया।

सती, इस अनादर से आहत होकर, बिना बुलाए ही यज्ञ में पहुँचीं। वहाँ जब उन्होंने अपने पि शिव का अपमान होते देखा, तो वे अपने अपमान और पिता की अधार्मिकता से विचलित होकर आग में कूद गईं और आत्मदाह कर लिया


                                     🌋 क्रोधित शिव और वीरभद्र का प्रकट होना

जैसे ही यह समाचार शिव तक पहुँचा, वे शोक और क्रोध से भर उठे। उनकी तीसरी आँख से रौद्र रूप प्रकट हुआ – उन्होंने अपने जटाजूट को झटकते हुए धरती पर पटका, और वहीं से उत्पन्न हुआ एक भयावह योद्धा – वीरभद्र। साथ ही, देवी भद्रकाली भी प्रकट हुईं।

इन दोनों को आदेश दिया गया कि वे दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दें। शिव की सेना ने देवताओं की सारी शक्ति को पराजित कर दिया। यज्ञ मंडप को तहस-नहस कर दिया गया, और अंत में वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया

                  🙏 देवताओं का पश्चाताप और दक्ष का पुनर्जन्म

जब देवताओं को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो वे ब्रह्मा और विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने सुझाव दिया कि वे शिव से क्षमा माँगें। शिव, अब शांत हो चुके थे – वे ध्यानमग्न मुद्रा में थे। देवताओं ने उनकी स्तुति की और उनसे दया की प्रार्थना की।

शिव ने दक्ष को पुनर्जीवित करने का वचन दिया, परंतु दंडस्वरूप उन्होंने बकरे का सिर उसके शरीर से जोड़ दिया। अन्य पुजारियों और देवों को भी उनके घावों से मुक्ति दी गई। यज्ञ पुनः शुरू हुआ, और इस बार पूर्ण विधि से संपन्न हुआ।

               🔱 सती के टुकड़े और शक्तिपीठों की स्थापना

हालाँकि शिव ने दक्ष को क्षमा कर दिया, परंतु सती के वियोग से उनका हृदय अब भी शोकग्रस्त था। वे सती की देह को अपने कंधे पर उठाकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। इससे सृष्टि की गति रुक गई, अराजकता फैलने लगी।

भगवान विष्णु ने इस संकट को समझते हुए अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित कर दिया। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। ये स्थल आज भी देवी उपासकों के लिए अत्यंत पवित्र माने जाते हैं।

                                  🕉️ एकांत और प्रतीक्षा

इस घटना के बाद शिव हिमालय की ओर चले गए, और गहन तपस्या में लीन हो गए। सती का स्वरूप कालातीत हो गया – और युगों बाद वह पार्वती के रूप में पुनः जन्म लेंगी, ताकि शिव-पार्वती का पुनर्मिलन फिर एक बार सृष्टि को संतुलन दे सके।


दक्ष का यज्ञ और सती का आत्मबलिदान

सती, शिव की पत्नी, जब अपने पिता दक्ष द्वारा यज्ञ में अपमानित हुईं, तो उन्होंने आत्मदाह कर लिया...

शिव का रौद्र रूप और वीरभद्र का प्रकोप

शिव ने अपने क्रोध से वीरभद्र और भद्रकाली को उत्पन्न कर दक्ष यज्ञ को विध्वंस कर दिया...

शिव की क्षमा और यज्ञ की पुनर्प्रतिष्ठा

शिव ने दक्ष को बकरे का सिर देकर पुनर्जीवित किया और यज्ञ को पुनः स्थापित किया...

शक्तिपीठों की स्थापना

विष्णु द्वारा सती के अंगों को खंडित कर पृथ्वी पर गिराए जाने से शक्तिपीठ बने...

इस कथा का संदेश

यह गाथा प्रेम, त्याग और अहंकार के विनाश का संदेश देती है, साथ ही शक्ति की उपासना का महत्व दर्शाती है।

ब्लॉग: santuti18.blogspot.com

टैग्स: सती कथा, शिव पुराण, वीरभद्र, दक्ष यज्ञ, शक्तिपीठ

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