विजयनगर — यह कोई साधारण शहर नहीं था। यह 'विजय की नगरी' थी, जहाँ मंदिरों की भव्यता और राजाओं की दिव्यता एक साथ सांस लेती थी। इसी भव्य साम्राज्य में, एक देवता की छवि हर पत्थर, हर मोड़, हर दिल में बसती थी — वह थे हनुमान, जिन्हें वहाँ बड़े प्रेम से अंजनेय कहा जाता था।
✨ देवताओं और राजाओं का नगर
विजयनगर के राजा केवल तलवार और ताज से नहीं, बल्कि धर्म और भक्ति से भी शासन करते थे। उनकी राजधानी भले ही वीरूपाक्ष (शिव) को समर्पित रही हो, लेकिन उनके हृदय में राम, कृष्ण, नरसिंह और वेंकटेश्वर बसे थे।
इन्हीं सब देवताओं में एक ऐसा भी था जो न केवल जनमानस का प्रिय था, बल्कि शाही परिवारों तक में पूजित — वह थे हनुमान।
कलाविद् अनीला वर्गीज लिखती हैं कि “विजयनगर में छोटे देवताओं में सबसे अधिक दिखने वाला चेहरा हनुमान का ही था।” मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण मूर्तियाँ, खंभों पर उभरी छवियाँ, गाँव-शहर के कोनों में बने छोटे-छोटे मंदिर — हर जगह अंजनेय की मौन उपस्थिति महसूस होती थी।
🌬️ माध्व परंपरा और हनुमान की महिमा
हनुमान की इस लोकप्रियता का एक बड़ा कारण था माध्व संप्रदाय की शिक्षाएँ।
मध्वाचार्य (आनंदतीर्थ) ने 13वीं सदी में इस परंपरा की स्थापना की थी और वे द्वैत दर्शन के प्रबल समर्थक थे — उनका मानना था कि भगवान विष्णु, जीव और प्रकृति तीनों अलग-अलग हैं और परमसत्ता केवल विष्णु को ही प्राप्त है।
माध्व परंपरा के अनुसार, वायु (मुख्य प्राण) भगवान विष्णु का मुख्य सहायक है। यही वायु तीन युगों में तीन रूपों में अवतरित होता है:
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त्रेता युग में — हनुमान बनकर, श्रीराम की सेवा में
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द्वापर युग में — भीम बनकर, श्रीकृष्ण के मित्र और पांडवों के रक्षक
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कलियुग में — स्वयं मध्वाचार्य के रूप में, आत्मा को मुक्ति की राह दिखाते हुए
इसलिए, हनुमान केवल रामायण का पात्र नहीं, बल्कि एक चिरकालिक, दिव्य शक्ति का प्रतीक हैं, जो हर युग में धर्म की रक्षा हेतु अवतरित होते हैं।
🛡️ विजयनगर में अंजनेय का प्रेम क्यों था इतना गहरा?
हनुमान में एक ऐसा मेल था जो विजयनगर जैसे साम्राज्य को गहराई से स्पर्श करता था:
शक्ति और विनम्रता, भक्ति और वीरता, सेवा और संकल्प।
जब उत्तर और दक्षिण से मुस्लिम आक्रमणकारी और प्रतिद्वंद्वी हिंदू राज्य विजयनगर की सीमाओं पर धावा बोलते थे, तब लोगों को भरोसा था कि हनुमान की छाया में वे सुरक्षित हैं।
उनकी पूजा केवल वेदों से नहीं, बल्कि कर्नाटक के तटीय तुलु क्षेत्र की लोक परंपराओं से भी पोषित थी। लोकगाथाओं और ग्रामीण श्रद्धा में वे पहले से ही उपस्थित थे — विजयनगर ने उस श्रद्धा को मंदिरों की भव्यता में बदल दिया।
🔱 निष्कर्ष: अंजनेय – विजयनगर का दिव्य रक्षक
जहाँ एक ओर विजयनगर कला, संस्कृति और स्थापत्य का केंद्र बना, वहीं दूसरी ओर हनुमान उस नगरी के शाश्वत रक्षक बनकर उभरे।
उनकी पत्थर की मूर्तियाँ हों या भक्ति में डूबी हुई स्तुतियाँ — हर रूप में वह यह भरोसा देते थे कि धर्म की राह पर चलने वाला कभी अकेला नहीं होता।
वे केवल देवता नहीं थे — वे उस “विजय” के प्रतीक थे, जो सत्य, निष्ठा और ईश्वर में आस्था से प्राप्त होती है।
🔍 ब्लॉग सारांश (हिंदी):
विजयनगर साम्राज्य में हनुमान — या अंजनेय — केवल एक पौराणिक चरित्र नहीं थे। वे लोगों के रक्षक, विश्वास के प्रतीक और धार्मिक चेतना का केंद्र बन गए थे।
माध्व परंपरा के अनुसार, वे वायु के अवतार थे — विष्णु के सहायक और हर युग के रक्षक। चाहे मंदिरों की दीवारें हों या जनमानस की आस्था, हर स्थान पर उनकी दिव्यता का प्रभाव स्पष्ट था।
हनुमान, विजयनगर के लिए, केवल एक पूज्य देवता नहीं — बल्कि विजय की नगरी के अमिट संरक्षक थे।
