हनुमान और पांडव: त्रेता से द्वापर तक की एक अमर कथा

Sanjay Bajpai
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यह कथा त्रेता युग के महावीर हनुमान और द्वापर युग के वीर पांडवों के बीच हुई दिव्य मुलाकातों का वर्णन करती है। हनुमान, जो चिरंजीवी हैं, भगवान राम के अनन्य भक्त होने के साथ-साथ द्वापर युग में भगवान विष्णु के कृष्ण अवतार के समय भी सक्रिय रहे। रामायण की समाप्ति के कई शताब्दियों बाद, हनुमान का यह पुनः प्रकट होना केवल एक संयोग नहीं था, बल्कि धर्म की स्थापना की निरंतरता का प्रतीक था।

भीम और हनुमान: गर्व की पराजय, विनम्रता की विजय

वनवास के दौरान, जब द्रौपदी ने सुगंधित दिव्य कमल की इच्छा व्यक्त की, तो बलशाली भीम उसे खोजने हिमालय की ओर निकल पड़े। उनके भारी कदमों की ध्वनि से शांत वन गूंज उठा, जिससे एक वृद्ध बंदर की वेशभूषा में ध्यानस्थ हनुमान जागे।

हनुमान ने अपने छोटे से शरीर को रास्ते में फैला दिया। भीम ने उन्हें हटने को कहा, तो उन्होंने अपनी पूँछ हटाने को कहा। लेकिन भीम अपनी पूरी शक्ति के बावजूद उस पूँछ को हिला तक नहीं सके। यह उनकी अहंता के लिए एक करारी चोट थी।

जब हनुमान ने अपना दिव्य रूप प्रकट किया और बताया कि वे भी वायु पुत्र हैं—भीम के दैविक भाई—तो भीम ने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया। हनुमान ने उन्हें कमल झील का मार्ग दिखाया और आशीर्वाद दिया कि वे युद्ध में उनके रक्षण के लिए उपस्थित रहेंगे। उन्होंने वचन दिया कि जब भी भीम युद्ध में गर्जना करेंगे, वे साथ होंगे।


अर्जुन और हनुमान: धनुर्विद्या और भक्ति का मिलन

एक अन्य अवसर पर, अर्जुन, अपने वनवास के समय, हिमालय में तप कर रहे थे। वहाँ एक ध्यानमग्न बंदर से उनका संवाद हुआ। जब अर्जुन ने श्रीराम के पत्थर के पुल निर्माण पर शंका जताई और कहा कि वह तो तीरों का मजबूत पुल बना सकते हैं, तब हनुमान ने चुनौती दी।

अर्जुन ने तीरों का एक सुंदर पुल बनाया, लेकिन जब हनुमान ने उस पर कदम रखा, तो वह ढह गया। अर्जुन व्यथित हुए और आत्मदाह का संकल्प लिया। उसी समय एक ऋषि रूप में कृष्ण प्रकट हुए और एक और प्रयास करने को कहा। इस बार अर्जुन ने मन में कृष्ण का स्मरण करते हुए पुनः पुल बनाया। हनुमान ने उस पर जमकर परीक्षा ली और तब देखा कि एक विशाल कछुए के रूप में स्वयं कृष्ण पुल को धारण कर रहे हैं।

हनुमान को जब एहसास हुआ कि उनके आराध्य राम ही कृष्ण रूप में सामने हैं, उन्होंने अर्जुन से क्षमा मांगी और वचन दिया कि वे महाभारत के युद्ध में उनके रथध्वज पर विराजमान रहेंगे।

कुरुक्षेत्र का युद्ध: ध्वज पर बैठा वह अमर रक्षक

महाभारत के युद्ध में, जब अर्जुन ने कृष्ण को सारथी बनाया, तब हनुमान अपने वचन के अनुसार उनके रथध्वज पर विराजमान थे। उनकी उपस्थिति से रथ अद्भुत शक्ति से युक्त था। कहा जाता है कि जब कर्ण के बाणों की वर्षा से रथ को कोई क्षति नहीं पहुँची, तो वह केवल हनुमान की दिव्य ऊर्जा के कारण था।

युद्ध समाप्त होने के बाद जब हनुमान रथ से उतरे, तभी रथ जलकर भस्म हो गया—यह दर्शाता है कि हनुमान की उपस्थिति ही उसका रक्षण कर रही थी। भगवद्गीता का संवाद, कृष्ण का विराट रूप, और अर्जुन की आत्मशुद्धि—इन सभी का साक्षी वही दिव्य हनुमान थे।

हनुमान: त्रेता और द्वापर के बीच की कड़ी

हनुमान की यह कथा न केवल भक्त और ईश्वर के बीच अटूट संबंध को दर्शाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि जब तक धर्म जीवित है, तब तक हनुमान जैसे रक्षक जीवित रहेंगे। हनुमान चालीसा में वर्णित यह पंक्ति—
"भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र के काज सवारे॥"
साक्षात महाभारत में साकार होती है।


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