ॐ एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म: वैदिक दर्शन की मूल धारा
"एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म सदसद्रूपं सदसदसीतं नान्यत् किञ्चिदस्ति त्रिकालधृतं त्रिकालातीतं वा सर्वन्तु खलु ब्रह्मैकं यत् किञ्च जगत्यामणु वा महद्वोदारं वानुदारं वा ब्रह्मैव तद् ब्रह्मैव जगदपि ब्रह्म सत्यं न मिथ्या॥"
एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म का अर्थ है – "वह एक, जो द्वितीय नहीं है"। यह वैदिक साहित्य में ब्रह्म की उस स्थिति को दर्शाता है जो न केवल अद्वितीय है, बल्कि समस्त सृष्टि का मूल है। ऋग्वेद के सृष्टि सूक्त (10.129) में “तदेकम्” के माध्यम से इस एकत्व का रहस्योद्घाटन होता है। उस समय न अस्तित्व था, न अनस्तित्व – केवल वह एक।
ऋग्वैदिक ऋषियों ने यह मान्यता दी कि सृष्टि की उत्पत्ति किसी मानव रूपी ईश्वर द्वारा नहीं बल्कि एक अवैयक्तिक शक्ति से हुई। यही विचार उपनिषदों में विस्तार पाता है, जहां “ब्रह्म” को सर्वव्यापक, निराकार और शुद्ध चेतना बताया गया है।
सृष्टि भजन में कवि प्रश्न करता है: क्या वह एक जानता है कि उसने क्या रचा? क्या वह स्वयं ही रचयिता है? यह दार्शनिक संदेह, आत्म-अन्वेषण का प्रारंभ है। यह प्रश्न हमें उस सत्य की ओर ले जाता है जिसे उपनिषद “नेति-नेति” के माध्यम से व्यक्त करते हैं – ब्रह्म को किसी एक सीमा में परिभाषित नहीं किया जा सकता।
ब्रह्म की अवधारणा
- ब्रह्म न तो स्त्रीलिंग है, न पुल्लिंग – यह तटस्थ चेतना है।
- यह न सीमित है, न अनंत – यह दोनों से परे है।
- ब्रह्म ही आत्मा है, और आत्मा ही ब्रह्म – “अहं ब्रह्मास्मि”।
उपनिषदों का कथन – “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (यह सब कुछ ब्रह्म ही है) – इस वैदिक एकत्व की पुष्टि करता है। इसका अर्थ है कि हर जीव, हर तत्व, हर अनुभूति – सब कुछ ब्रह्म का ही विस्तार है।
निष्कर्ष
“एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” केवल एक धार्मिक या दार्शनिक विचार नहीं, यह जीवन को देखने का एक समग्र दृष्टिकोण है। यह जानना कि हम सभी उसी ब्रह्म का अंश हैं, आत्म-ज्ञान की दिशा में पहला कदम है।
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