परशुरामेश्वर मंदिर" ( Gudimallam Shiva Temple)

Sanjay Bajpai
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परशुरामेश्वर मंदिर (Gudimallam Shiva Temple) का इतिहास, वास्तुकला और पुरातात्विक महत्त्व

परशुरामेश्वर मंदिर (Gudimallam Shiva Temple) का इतिहास, स्थापत्य और सांस्कृतिक महत्त्व

भारत की मंदिर परंपरा विश्व में अपनी प्राचीनता और कलात्मक विशिष्टता के लिए जानी जाती है। आंध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले में स्थित परशुरामेश्वर मंदिर, जिसे गुडीमल्लम शिव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, इसी गौरवशाली धरोहर का जीवंत प्रमाण है। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय मंदिर स्थापत्य के प्रारंभिक चरण का बेजोड़ उदाहरण भी है।

1. मंदिर का नाम और शिलालेखीय साक्ष्य

मंदिर के भीतर और परिसर की दीवारों पर कई शिलालेख मिले हैं जिनमें इसे परशुरामेश्वर मंदिर के रूप में उल्लेखित किया गया है। यद्यपि मंदिर के मूल निर्माता का कोई प्रत्यक्ष उल्लेख इन शिलालेखों में नहीं मिलता, लेकिन इनमें विभिन्न शासकों द्वारा मंदिर को दी गई भूमि, धन, और गायों के दान का विस्तृत वर्णन है।

सबसे प्राचीन शिलालेख पल्लव वंश के शासक नंदीवर्मा पल्लवमल्ल (802 ई.) के शासनकाल का है। इसके अतिरिक्त पल्लव, यादव देवरायलु, गंग पल्लव, बाण और चोल शासकों के काल में भी इस मंदिर को संरक्षण प्राप्त होता रहा।

2. पुरातात्विक खोजें और मंदिर की प्राचीनता

वर्ष 1973 में इस क्षेत्र में किए गए पुरातात्विक उत्खनन में दूसरी और तीसरी शताब्दी ईस्वी के काले और लाल मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े प्राप्त हुए। इसके साथ ही 42x21x6 इंच आकार की बड़ी ईंटें भी मिलीं जो प्राचीन मंदिर निर्माण तकनीक की पुष्टि करती हैं।

ये सभी खोजें आंध्र सातवाहन काल की विशेषताओं से मेल खाती हैं, जिससे इतिहासकारों का यह मत बना है कि यह मंदिर संभवतः 1st–2nd century CE के बीच निर्मित हुआ होगा। हालांकि, इस पर व्यापक शोध और संदर्भित प्रमाणों की आवश्यकता बनी हुई है।

3. वास्तुशिल्प विशेषता और गर्भगृह की बनावट

मंदिर का गर्भगृह एक वर्गाकार संरचना में बना हुआ है। मंदिर के आंतरिक स्तंभ, मंडप और लघु द्वार इसकी अत्यंत प्राचीन स्थापत्य प्रणाली को दर्शाते हैं।

प्रसिद्ध वास्तुविद हिमांशु राय के अनुसार, गर्भगृह का डिज़ाइन अर्धवृत्ताकार प्रभावलकड़ी या अन्य नाशवान सामग्री से बने किसी अति प्राचीन ढाँचे की प्रतिकृति हो सकता है। बाद के जीर्णोद्धारों में इस शैली को बनाए रखा गया।

4. धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

यह मंदिर शिव को समर्पित है, और परशुरामेश्वर नाम शिव के परशुराम अवतार को सूचित करता है। यहां प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती रही है और दानदाताओं ने अपने शिलालेखों में मंदिर के प्रति गहन श्रद्धा व्यक्त की है।

हालांकि मंदिर को स्थानीय रूप से “गुडीमल्लम मंदिर” कहा जाता है, परंतु किसी भी शिलालेख में इस नाम का उल्लेख नहीं मिलता है, जिससे नामकरण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं।

5. स्थापत्य शैलियों का संक्रमण

इस मंदिर के निर्माण में समय के साथ विभिन्न कालों की शैलियों का समावेश हुआ है। प्रारंभिक चरण में जहाँ सातवाहन शैली की झलक मिलती है, वहीं बाद में पल्लव और चोल काल की द्रविड़ स्थापत्य शैली के प्रभाव भी दृष्टिगोचर होते हैं। यह मंदिर अपने आप में एक स्थापत्य संक्रमणकालीन अध्ययन का आदर्श नमूना बन गया है।

6. वर्तमान स्थिति और संरक्षण

वर्तमान में यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित है और यह राष्ट्रीय धरोहर के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुका है। पर्यटक, इतिहास प्रेमी, वास्तुविद और अध्येता इस मंदिर को देखने आते हैं ताकि वे भारत की प्राचीन आध्यात्मिक और स्थापत्य विरासत का अनुभव कर सकें।

🧭 निष्कर्ष

परशुरामेश्वर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह भारत के सांस्कृतिक, स्थापत्य और ऐतिहासिक विरासतभारत के सबसे प्राचीन शिव मंदिरों में से एक


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