दक्षिणामूर्ति स्तोत्र

Sanjay Bajpai
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दक्षिणामूर्ति स्तोत्र: शिव श्रेष्ठ गुरु के रूप में

दक्षिणामूर्ति स्तोत्र: शिव श्रेष्ठ गुरु के रूप में

अद्वैत वेदांत की विशाल चित्रपट में, दक्षिणामूर्ति स्तोत्र एक दीप्तिमान स्तुति के रूप में प्रकाशमान होता है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित इस स्तोत्र में शिव को परम गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इसकी काव्यात्मक छवियों के माध्यम से यह स्तोत्र देव और शिष्य के बीच की सीमाओं को मिटाकर मौन में आत्मा की अनुभूति की ओर आमंत्रित करता है।

शिव: आदर्श गुरु का स्वरूप

शंकराचार्य दक्षिणामूर्ति को ज्ञान का आदर्श रूप बताते हैं। श्लोक 1 में वर्णित है कि शिव “स्वप्न की भाँति समस्त जगत को अपने परम में अनुभव करते हैं।” श्लोक में कहा गया है कि यह ब्रह्मांड उनकी विशाल सत्ता से प्रकाशित होता है, जो संबंध और स्रोत दोनों है।

अद्वैत दृष्टि के अंश

में माया यानि संसार को सौम्य हीन रूप में देखा गया है, यह सिखाता है कि भेदभाव केवल मानसिक भ्रम है। में शिव के विभिन्न रूपों के माध्यम से यह संदेश दोहराया गया है कि व्यक्तित्व केवल एकल आत्मा का प्रतिबिंब है।

माया और विमोचन

श्लोक में दक्षिणामूर्ति को “महादर्शक एवं मोक्षदाता” कहा गया है। हीन-अहंभाव का अंकन मिटाकर ये श्लोक आत्मा की वास्तविकता की ओर ले जाते हैं। यह विमोचन लक्ष्य नहीं, अपितु चैतन्य का स्वतः उद्घाटन है।

अभिन्न आत्म-पहचान पर आघात

श्लोक में गुरु की दृष्टि और मुद्रा के द्वारा शरीर, कर्म और चिंतन के बंधनों को तोड़ा जाता है। प्रत्येक शिक्षण क्षण शिष्य को सशरीर सीमाओं से मुक्त होने का अवसर प्रदान करता है।

आंतरिक अन्वेषण का मार्ग

श्लोक श्रवण-मनन-निदिध्यासन के त्रिकरणीय मार्ग को रेखांकित करता है:

  1. श्रवण: शास्त्र-शिक्षाओं का ध्यानपूर्वक श्रवण
  2. मनन: अर्थ का विवेचन
  3. निदिध्यासन: गहन चिंतन और आत्म-साक्षात्कार

मौन और मुद्रा में रहस्योद्घाटन

“दिव्य मौन” को ज्ञान का स्रोत बताते हैं। साथ ही, गुरु की मुद्राएँ वाणी से परे सत्य का संप्रेषण करती हैं, यह स्मरण कराती हैं कि परमज्ञान भाषा से परे है।

ऋषि परंपरा

शंकराचार्य महान ऋषियों और गुरुओं का स्मरण कराते हैं जिन्हें इस महागुरु ने दिव्य ज्ञान की ज्योति प्रदान की। मानव गुरु को दिव्य परंपरा का अभिन्न अंग मानकर यह स्तोत्र सत्य के प्रवाह को सभी तक पहुंचाता है।

भक्ति में दिव्यता की अनुभूति

शंकराचार्य के लिए दक्षिणामूर्ति को नमन करना केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि परमात्मा की अनुभूति का अभिनव साधन है। इस भक्ति से शिष्य और ईश्वर के बीच की दूरी लुप्त हो जाती है।

निष्कर्ष: गुरु सिद्धांत का साक्षात्कार

दक्षिणामूर्ति स्तोत्र केवल भक्ति काव्य नहीं, बल्कि आत्म-प्रकाश का एक जीवंत पाठ है। इसके उपदेशों का श्रवण-मनन-निदिध्यासन के माध्यम से अनुभव करते हुए शिष्य अपने वास्तविक स्वरूप का प्रत्यक्ष बोध करता है। मौन में जागृत होने पर मोक्ष की दशा उत्पन्न होती है।

श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये॥१॥

भावार्थ:

जैसे दर्पण में प्रतिबिंबित नगर केवल आभासी होता है, वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व आत्मा के भीतर ही है, लेकिन माया के कारण बाहर प्रकट होता हुआ प्रतीत होता है। जागरण के क्षण में जो आत्मा को अद्वितीय रूप में साक्षात् करता है, उस गुरु रूपी दक्षिणामूर्ति को मेरा नमस्कार।

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