🕉️ अवधूत गीता: अद्वैत वेदांत की परम अनुभूति
हिन्दू दर्शन के अद्भुत रत्नों में *अवधूत गीता* एक अनोखी और शक्तिशाली रचना है। इसका रचनाकार महात्मा दत्तात्रेय को माना जाता है, जो कृष्ण और यीशु के मध्य काल में जीवित थे। उन्होंने एक ही ग्रंथ लिखा—यह 193 श्लोकों का संकलन गहन आत्मबोध की अभिव्यक्ति है।
🌌 शुद्ध अद्वैत की अनुभूति
*अवधूत* का अर्थ है वह जो संसार के सभी बंधनों से मुक्त हो चुका है। इस गीता में दत्तात्रेय स्पष्ट रूप से कहते हैं—"मैं न बंधन में हूँ, न मुक्ति में। मैं न इस लोक से जुड़ा हूँ, न परलोक से।" यह कोई कल्पना नहीं है; यह उनकी सिद्ध अवस्था की अभिव्यक्ति है।
📿 विद्रोही संत का संदेश
यह गीता किसी विधि-विधान या कर्मकांड को नहीं अपनाती। इसमें तो यह तक कहा गया है—"ना गुरु है, ना शिष्य, ना तू है, ना मैं।" यह ग्रंथ मन और माया की सीमाओं को तोड़ने की क्षमता रखता है।
*अवधूत गीता* को केवल पढ़ा नहीं जाता—उसे आत्मसात किया जाता है। यह आत्मज्ञान के उस बिंदु तक ले जाती है, जहाँ शब्द नहीं पहुंचते।
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