तमिल नाडु की शक्तिशाली लोक देवियाँ – अम्मन मंदिर**
तमिल नाडु के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में, **अम्मन मंदिर** लोकपरंपरा के शक्तिशाली प्रतीक हैं, जो गाँवों के जीवन और प्राचीन मान्यताओं में गहराई से जड़े हुए हैं। ये मंदिर मुख्य रूप से उन देवियों को समर्पित हैं जिन्हें संरक्षक और करुणामयी माँ के रूप में पूजा जाता है। ये सिर्फ पूजा के स्थान नहीं हैं—बल्कि वे समुदाय, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करते हैं।
इस परंपरा के केंद्र में हैं **पार्वती**, भगवान शिव की दिव्य पत्नी, जिनके कई लोक रूपों की पूजा यहाँ की जाती है। इनमें से सबसे प्रमुख हैं **एल्लैअम्मन**—शाब्दिक अर्थ में *"सीमा की माँ"*। इन देवियों को आमतौर पर गाँवों की सीमाओं पर स्थापित किया जाता है, क्योंकि मान्यता है कि वे बीमारियों, महामारियों और बुरी नजर से बचाव करती हैं। इनकी सीमा पर स्थापना एक संकेत है—वे समुदाय की भौतिक और आध्यात्मिक सीमाओं की रक्षा करती हैं।
### मिलिए अम्मन से: लोगों की रक्षक देवियाँ
**मारिअम्मन** सभी अम्मन देवियों में सबसे प्रसिद्ध हैं। चेचक और अन्य बीमारियों से बचाव के लिए उनकी पूजा की जाती है। ग्रामीण तमिल समुदाय में उनकी उपस्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। मारिअम्मन की पूजा में पशु बलि नहीं दी जाती, जो उनके शांत और दयालु स्वरूप को दर्शाता है।
फिर हैं **येल्लम्मा**, जिनके साथ एक जटिल और विवादास्पद इतिहास जुड़ा है। येल्लम्मा को **रेणुका देवी** से जोड़ा जाता है, जो महर्षि जमदग्नि की पत्नी थीं और जिनका सिर उनके ही पुत्र परशुराम ने पिता के आदेश पर काट दिया था। कहा जाता है कि बाद में उन्हें एक निम्न जाति की महिला **मातंगी** के सिर को जोड़कर जीवित किया गया। इसलिए वे **मातंगी** के रूप में भी पूजी जाती हैं, खासकर पल्लर और परियार जैसी पिछड़ी जातियों द्वारा। यह कथा दिव्य शक्ति और सामाजिक विषमता के बीच की जटिलता को दर्शाती है।
येल्लम्मा के पंथ का संबंध पवित्र वेश्यावृत्ति के संस्थान से रहा है, जो भले अब लगभग समाप्त हो चुका है, लेकिन इस बात को दर्शाता है कि लोक हिंदू धर्म में भक्ति, लिंग और जाति कैसे गूँथे हुए हैं।
एक अन्य तीव्र रूप है **पिडारिअम्मन**, जिनकी पूजा पशु बलि के साथ की जाती है। यहाँ बलि में आमतौर पर एक नर भैंस का चयन किया जाता है और इस कार्य को **पाड़याची जाति** के पुरुष करते हैं। यह रक्त बलि पिडारी के योद्धा स्वरूप को दर्शाती है—एक ऐसी देवी जो सुरक्षा के बदले बल और साहस माँगती है।
दूसरी ओर, **अंगला अम्मन** (संस्कृतीकृत रूप में **अंगला परमेश्वरी**) एक शांत और मातृत्वपूर्ण शक्ति हैं। उनकी पूजा में भी पशु बलि नहीं दी जाती, जो उनके शुद्ध और दयालु स्वभाव को दर्शाता है।
### कन्नगी: अन्याय से जन्मी देवी
सभी अम्मन देवियाँ पौराणिक कथाओं से नहीं आई हैं—कुछ तो महाकाव्यों की त्रासदी से जन्मी हैं। **कन्नगी**, तमिल महाकाव्य *शिलप्पधिकारम* की नायिका, ऐसी ही एक आकृति हैं। जब उनके पति कोवलन को न्याय के बिना मृत्युदंड दे दिया जाता है, तो कन्नगी का क्रोध पूरे राज्य को तबाह कर देता है। विश्वास, न्याय और स्त्री शक्ति की प्रतीक बन चुकी कन्नगी आज भी तमिल समुदाय में एक लोक देवी के रूप में पूजी जाती हैं। उनकी कथा पीढ़ियों तक एक चेतावनी और प्रेरणा के रूप में जारी है।
### अम्मन पूजा क्यों महत्वपूर्ण है?
अम्मन परंपरा सिर्फ लोक धर्म नहीं है—यह तमिल सांस्कृतिक जीवन की गहराई, विविधता और लचीलेपन का जीवंत प्रमाण है। ये देवियाँ, अक्सर मुख्यधारा के हिंदू धर्म के कठोर ढांचे से बाहर काम करती हैं, खासकर महिलाओं और निम्न जाति समुदायों को सशक्त बनाती हैं। यह वह स्थान है जहाँ भक्ति जाति और पदानुक्रम से ऊपर उठ जाती है।
सीमा पर स्थित मंदिरों से लेकर गाँव के मंदिरों तक, चुपचाप प्रार्थनाओं से लेकर नाटकीय बलि तक—अम्मन अपने लोगों की रक्षा करती रहती हैं—क्रोधित, मातृत्वपूर्ण, और निर्विवाद रूप से दिव्य।
प्रमुख अम्मन मंदिर और उत्सव
1. संपंगे स्वर्ण अम्मन मंदिर (Sampangi Amman Temple, चेन्नई)
चेन्नई के इस पुराने मंदिर में अम्मन को गाँव की रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है। यहाँ विशेष रूप से आदि महीने (जुलाई-अगस्त) में अम्मन उत्सव मनाया जाता है, जिसमें महिलाएँ कन्याओं को हल्दी-कुमकुम देती हैं और पारंपरिक गीतों से देवी का स्वागत करती हैं।
2. सलेम की करुप्पन्ना अम्मन
यह मंदिर अपने रक्त बलि उत्सव के लिए जाना जाता है, जहाँ ग्रामीण अपनी फसलों की रक्षा के लिए देवी को प्रसन्न करने हेतु विशेष अनुष्ठान करते हैं। इस परंपरा में जातीय नेतृत्व और ग्रामीण पंचायतों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है।
3. समयपुरम मरिअम्मन मंदिर (Trichy)
तमिलनाडु का यह सबसे प्रसिद्ध मरिअम्मन मंदिर है। यहाँ 'थिरुविळा' (Temple Car Festival) में हज़ारों श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। कई भक्त अंगारों पर नंगे पाँव चलकर देवी के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित करते हैं।
4. मेलमुत्तूर अंगालम्मन मंदिर (तंजावुर ज़िला)
यहाँ अंगाल अम्मन की पूजा विशेष रूप से पारंपरिक कोलाट्टम (नृत्य) और भजन मंडलियों के साथ होती है। इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है—बल्कि एक पवित्र पत्थर को ही शक्ति का प्रतीक मानकर पूजा की जाती है, जो इस परंपरा की लोक जड़ों को दर्शाता है।
5. कांचीपुरम की कामाक्षी अम्मन
हालांकि यह एक प्रमुख वैदिक मंदिर है, लेकिन तमिल अम्मन परंपरा से इसका गहरा संबंध है। कामाक्षी देवी का स्वरूप स्त्री की सौम्यता और शक्ति का सम्मिलन है, और यहाँ की पूजा प्रणाली में भी लोकतत्वों का समावेश मिलता है।
लोक अनुष्ठान और देवदासी परंपरा
कुछ अम्मन मंदिरों से अब लुप्त हो रही देवदासी परंपरा भी जुड़ी रही है। जैसे येल्लम्मा पंथ में यह परंपरा सामाजिक भेदभाव का प्रतीक थी, वैसे ही कुछ अम्मन मंदिरों में भी इसे भक्ति और बलिदान के मध्य के संघर्ष के रूप में देखा जा सकता है। यह चर्चा आपके लेख को सामाजिक विमर्श की दिशा भी दे सकती है।
अम्मन पूजा और पर्यावरण
अम्मन मंदिरों के चारों ओर अक्सर नीम, पीपल और वटवृक्ष लगाए जाते हैं, क्योंकि इन्हें देवी का आवास माना जाता है। इस तरह अम्मन पूजा पर्यावरण-संवेदनशीलता से भी जुड़ी हुई है। पारंपरिक रीति से गाँवों की सीमा पर स्थित अम्मन मंदिर, एक प्रकार की जैविक सीमारेखा (eco-boundary) भी स्थापित करते हैं।
