भगवान शिव की अद्भुत कथा: करुणा, ज्ञान और संहार के देवता की गाथा

Sanjay Bajpai
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🔱 भगवान शिव की कथा

बहुत समय पहले, जब सभ्यता अभी अपने पहले कदम रख रही थी, एक योगी ने ध्यान में बैठे हुए संसार को अचंभित कर दिया था। वह कोई साधारण पुरुष नहीं था — वे स्वयं भगवान शिव थे।

प्राचीन सिंधु-सरस्वती सभ्यता में लोग उन्हें ध्यान की मुद्रा में देखकर चमत्कृत हो जाते थे। वे पहले योगी थे — आदि योगी। और ध्यान की विधि के प्रथम शिक्षक — आदि गुरु

कालचक्र घूमता गया। फिर वह समय आया जब देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए समुद्र मंथन किया। पहले निकला... विष! इतना भयंकर कि पूरे ब्रह्मांड को भस्म कर सकता था।

कौन बचाएगा ब्रह्मांड को? सभी ने भगवान शिव से विनती की।

भगवान शिव ने बिना एक क्षण गँवाए वह विष पी लिया — पर निगला नहीं। उन्होंने उसे अपने कंठ में ही रोक लिया। तभी से वे कहलाए — नीलकंठ

वह विष उनके लिए हार बन गया — एक ऐसा हार जो उन्हें याद दिलाता है कि दूसरों का कष्ट बाँटना ही सच्चा बलिदान है।

उनका जीवन केवल करुणा नहीं था — वे नृत्य के देवता भी बने। उनका नटराज रूप दर्शाता है कि कैसे सृजन और संहार एक ही नृत्य का हिस्सा हैं।

उनके एक हाथ में डमरू — जिससे ध्वनि निकली, और ध्वनि से बना सृजन। दूसरे हाथ में अग्नि — जो सबकुछ भस्म कर सकता है।

उनका एक पैर अज्ञानता पर था — दिखाता है कि ज्ञान से ही मोक्ष संभव है।

जब वे नाचते हैं, तो सृष्टि हिलती है। पर उनका चेहरा रहता है... पूर्ण शांति में।

एक समय आया जब उन्होंने विवाह किया — देवी उमा से। लेकिन उनका यह प्रेम सरल नहीं था। उमा ने अपने पिता दक्ष का विरोध किया, क्योंकि उन्होंने शिव का अपमान किया था।

उमा ने अपने प्राण त्याग दिए, और अगले जन्म में पार्वती बनीं — हिमालय की पुत्री — और पुनः शिव से विवाह किया। यह प्रेम, त्याग और पुनर्जन्म की अनुपम कथा थी।

शिव के कई रूप हैं — दक्षिणमूर्ति बनकर वे मौन से ज्ञान देते हैं, अर्धनारीश्वर बनकर प्रकृति और पुरुष की एकता दिखाते हैं।

उनकी जटाओं में बहती है गंगा — पवित्रता और ऊर्जा का प्रतीक। उनके त्रिशूल में समाहित है — प्रेम, क्रिया, और ज्ञान।

आज भी जब कोई भक्त 'ॐ नमः शिवाय' कहता है, तो वह केवल शिव को नहीं पुकारता — वह स्वयं को जगाता है।

भगवान शिव की कथा | नीलकंठ महादेव की रहस्यमयी गाथा - योग, तांडव और करुणा हर हर महादेव!

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