वेदांत दर्शन – चेतना की अंतिम यात्रा

Sanjay Bajpai
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वेदांत दर्शन: चेतना का विस्तार और ब्रह्म की खोज

वेदांत दर्शन – चेतना की अंतिम यात्रा

वेदांत भारतीय दर्शन का छठा प्रमुख स्तंभ है। इसकी उत्पत्ति उपनिषदों में हुई, लेकिन इसकी स्थापना और प्रसार में बौद्ध धर्मगुरुओं और ऋषियों की भी अहम भूमिका रही। "वेद" का अर्थ है ज्ञान और "अंत" का अर्थ है पराकाष्ठा या निष्कर्ष। अतः वेदांत का अर्थ है – ज्ञान का अंतिम उद्देश्य

सीखने, पूछताछ करने और विवेचना के लिए ज्ञान आवश्यक है, लेकिन जब बात आत्मा के आत्मा में विलय की आती है, तो अत्यधिक ज्ञान स्वयं एक बाधा बन सकता है। व्यक्ति यदि ज्ञान में ही उलझ जाए, तो वह सत्य तक पहुँचने में चूक सकता है।

वेदांत हमें सिखाता है कि सच्चा ज्ञान पुस्तकों से नहीं, बल्कि स्वयं की चेतनाचेतन क्रियाएँ ही हमारी जीवित पुस्तक

उपनिषद: वेदांत का मूल ग्रंथ

वेदांत दर्शन को ही उपनिषदगुरु के निकट बैठकर सत्य को सुनना और आत्मसात करना। इसमें किसी प्रकार का तर्क, तुलना या शंका नहीं होती – केवल प्रबुद्ध शिष्य और गुरु के बीच का संवाद होता है।

वेदांत में ईश्वर को "ब्रह्म" कहा गया है – जिसका अर्थ है चेतना का असीम विस्तार। इस दर्शन में यह मान्यता है कि केवल चेतना ही अंतिम सत्य है – बाकी सब माया (अस्थायी) है।

वेदांत और वैज्ञानिक समानता

अमेरिकी खगोलशास्त्री एडविन हब्बल (1889–1953) ने बताया कि ब्रह्मांड फैल रहा है। लेकिन हजारों वर्ष पहले ही बादरायण ने इसी सत्य को "ब्रह्माण्ड" शब्द द्वारा व्यक्त किया था – जिसका अर्थ है फैलता हुआ चेतन अंडा (ब्रह्म = विस्तार, अण्ड = अंडा)।

बादरायण के अनुसार, हम सभी एक सार्वभौमिक चेतना में भाग लेते हैं – जैसे हम सभी प्रकाश को साझा करते हैं। यही वेदांत का सार है – हम ब्रह्म हैं, और यह ब्रह्म ही चेतना है।

वेदांत और आयुर्वेद

वेदांत दर्शन को आयुर्वेद ने भी स्वीकार किया है। स्वास्थ्य केवल शारीरिक नहीं, बल्कि चेतना की समग्र स्थिति

वेदांत हमें केवल ज्ञान नहीं, आत्म-बोधस्वयं को जानने


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