गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य : नचना से देओढ़ (देओगढ़) तक की यात्रा
लेखक: संजय बाजपेई · श्रेणी: भारतीय स्थापत्य · भाषा: हिन्दी
परिचय
भारत का धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास निरंतर परिवर्तित होता रहा है। गुप्त काल के आगमन के साथ वैदिक यज्ञ-कुंड पर निर्भर पूजा पद्धतियों से ध्यान धीरे-धीरे मंदिर-आधारित पूजा (पूजा, मूर्ति-आराधना) की ओर गया। यही वह समय था जब मूर्तिकला, प्रतीकवाद और स्थापत्य में नए रूप जन्मे।
नचना पार्वती से देओढ़ विष्णु तक — एक स्थापत्य यात्रा
गुप्तकाल में बने नचना पार्वती मंदिर और देओढ़ के विष्णु मंदिर ने समकालीन धार्मिक भावनाओं और स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण दिया। इन मंदिरों में न केवल देव प्रतिमाओं को स्थान मिला, बल्कि परिसर और मूर्तिकला के माध्यम से धार्मिक कथाओं को भी अभिव्यक्त किया गया।
गुप्तकाल में मंदिर निर्माण की कला
गुप्तकाल के मंदिरों में पंचायतन योजना, शिखर (वास्तुशिल्प), गर्भगृह और मंडप जैसे घटक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। शिव और विष्णु के लिए बनाये गए देवालयों में प्रतीकात्मकता (जैसे पर्वत प्रतीक) का प्रयोग आम था — जो उस समय के दर्शन और पूजा-रिवाज को दर्शाता है।
नचना और देओढ़: दर्शन, कथा और कला का संगम
नचना और देओढ़ जैसे स्थलों पर मंदिर केवल पूजा का ठिकाना नहीं थे — ये कथाओं के दृश्य थे। मूर्तिकला में शास्त्रीय कथानक, देवताओं की मुदाएँ और स्थानीय पौराणिक तत्व एक साथ मिलते दिखते हैं। पंचायतन प्रणाली और शिल्पकौशल ने इन स्थानों को कला के दृष्टिकोण से अमूल्य बनाया।
गुप्तकालीन मंदिरों में पर्वत प्रतीकवाद
पर्वत का प्रतीक अक्सर शिव-पार्वती और विष्णु कथाओं में देखा जाता है — जैसे कैलाश का विचार। गुप्तकालीन मूर्तियों और फ्रिज़ों में पर्वत, नाग और अनंत शकुंतल प्रतीकों के रूप में उभरते हैं, जो आध्यात्मिक यात्रा और दिव्यता का संकेत देते हैं।
गुप्तकालीन स्थापत्य का स्वर्णयुग
गुप्तकाल को अक्सर भारतीय कला और स्थापत्य का स्वर्णयुग माना जाता है। नचना पार्वती और देओढ़ विष्णु मंदिर-कथा इसी युग की भव्यता और सूक्ष्म शिल्पकला का प्रतिबिंब हैं — जो आज भी इतिहासकारों तथा पुरातत्वविदों के लिये अध्ययन का महत्त्वपूर्ण विषय हैं।
निष्कर्ष
गुप्तकालीन मंदिर सिर्फ स्थापत्य संरचनाएँ नहीं थीं — वे धार्मिक, सामाजिक और कलात्मक चेतना के केन्द्र थे। नचना से देओढ़ तक की यह यात्रा हमें उस युग की सूक्ष्मता, धार्मिक प्रतीकवाद और शिल्पशैली से परिचित कराती है। आगे शोध और संरक्षण से ये धरोहरें आने वाली पीढ़ियों के लिए और भी स्पष्ट होंगी।
