बुद्ध के जन्म से करीब डेढ़ सौ साल पहले, जब गंगा घाटी के राज्यों में वैदिक यज्ञ और दार्शनिक बहसों का दौर था, तब कौशांबी इन चर्चाओं का केंद्र नहीं था। असली नाम तब चमक रहा था विदेह का – जिसकी राजधानी मिथिला थी। कहते हैं, मिथिला पहुँचने में अयोध्या से चार दिन लगते थे।
यह वही भूमि थी जहाँ के राजा जनक न केवल उदारता के लिए जाने जाते थे, बल्कि गूढ़ सवाल पूछने और सच्चाई तलाशने की जिज्ञासा के लिए भी मशहूर थे। उनके दरबार में ऐसी प्रतियोगिताएँ होतीं, जहाँ सोने–चाँदी और हज़ारों गायों का दान दिया जाता। विद्वान ब्राह्मण यज्ञ के रहस्यों पर बहस करते और एक–एक विचार इतना गहरा होता कि आज से तीन हज़ार साल बाद भी आधुनिक चिंतक उसे महत्व देते हैं।
मिथिला की उत्पत्ति की कथा
विदेह की उत्पत्ति का इतिहास रहस्य से ढका है। विष्णु पुराण की कथा कहती है कि इक्ष्वाकु वंश के निमि नामक राजा ने यज्ञ करने की ठानी। पर उस समय के महान ऋषि वसिष्ठ ने मना कर दिया, क्योंकि वे इन्द्रदेव के लिए यज्ञ कर रहे थे। निराश होकर निमि ने गौतम ऋषि को बुलाया। जब वसिष्ठ को यह बात पता चली तो उन्होंने निमि को शाप दे दिया कि उसका शरीर नष्ट हो जाए। निमि ने भी प्रत्युत्तर में वसिष्ठ को शाप दे दिया।
निमी के निधन के बाद ऋषियों ने उसके त्यागे हुए शरीर को मथा और उसमें से एक पुत्र उत्पन्न हुआ – मिथि। यही मिथि मिथिला का पहला राजा बना। मिथि से शुरू हुआ वह वंश जिसमें हर राजा को “जनक” कहा गया, क्योंकि मिथि स्वयं किसी माता-पिता से पैदा नहीं हुए थे बल्कि ‘स्वयंभू’ थे।
जनक और विदेह की ख्याति
मिथिला की धरती ही आगे चलकर सीता माता की जन्मभूमि बनी। रामायण बताती है कि अयोध्या से आए राम ने यहाँ सीता का स्वयंवर जीता था। सीता के पिता राजा शिरध्वज जनक, जनक वंश के नौवें राजा थे। उसी वंश में आगे एक ऐसा जनक हुआ जिसने ब्राह्मणों और दार्शनिकों के लिए अपने दरबार के द्वार खोल दिए और बौद्धिक प्रतियोगिताओं में अपार धन लुटाया।
यही वह समय था जब शुक्ल यजुर्वेदीय ब्राह्मणों ने अपने वैदिक ग्रंथों का संकलन किया। इसी भूमि से दो महान कृतियाँ निकलीं –
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शतपथ ब्राह्मण : जिसमें अग्निचयन यज्ञ का विस्तार से वर्णन है।
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बृहदारण्यक उपनिषद् : जिसने दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन की ऐसी नींव रखी, जिसे आज भी विश्व साहित्य की धरोहर माना जाता है।
👉 मिथिला केवल एक राज्य नहीं था, यह विचारों और आत्मचिंतन की भूमि थी। यहाँ यज्ञ की अग्नि से अधिक तेज़ जलती थी ज्ञान की लौ, जो कालांतर में उपनिषदों और रामायण जैसी अमर कृतियों में उज्ज्वल हुई।
