सिलप्पतिकारम् : प्रेम, न्याय और दिव्य क्रोध का कालजयी तमिल महाकाव्य
यदि आप सिलप्पतिकारम् (जिसे सिल्लापतिकारम, सिलप्पथिकरम या बोलचाल में “शोल्लपडिकारम” भी कहा जाता है) की बात कर रहे हैं, तो आप तमिल साहित्य के सबसे महान रत्नों में से एक को छू रहे हैं। यह सिर्फ एक कहानी नहीं—बल्कि प्रेम, निष्ठा, अन्याय, प्रतिशोध और दिव्यता का जीवित सांस्कृतिक दस्तावेज़ है।
लगभग 1500 साल पहले रचित यह महाकाव्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
लेखक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस महाकाव्य का श्रेय प्रख्यात जैन साधु इळंगो अडिगल (Ilango Adigal) को दिया जाता है। लोककथाओं के अनुसार वे चेरा राजा के भाई थे, जिन्होंने राजगद्दी त्यागकर सन्यास लिया। हालांकि विद्वानों में इस कथा को लेकर मतभेद है।
महाकाव्य लगभग 2वीं से 6वीं शताब्दी CE के बीच रचा गया माना जाता है। उस समय तमिल समाज में—
- जैन
- बौद्ध
- प्रारंभिक हिंदू परंपराएँ
- समुद्री व्यापार
- शहरी संस्कृति
का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
कथा तीन प्राचीन तमिल राज्यों में घूमती है:
- चोल (पुहार)
- पांड्य (मदुरै)
- चेरा (वांची)
कहानी तीन महान अध्यायों में
महाकाव्य की 5730 पंक्तियाँ तीन कांड़ (Books) में बटी हैं। यह महागाथा दंपत्ति कोवलन और उसकी पवित्र, न्यायप्रिय पत्नी कन्नगी की दुखांत यात्रा को वर्णित करती है।
1. पुहार कांड़ – प्रेम, कला और विश्वासघात (चोल राज्य)
समृद्ध बंदरगाह शहर पुहार में कोवलन और कन्नगी सुखी जीवन जी रहे थे।
लेकिन एक मोड़ आता है—
- कोवलन प्रसिद्ध नर्तकी माधवी पर मोहित हो जाता है।
- उसके नृत्य और संगीत पर अपनी संपत्ति लुटा देता है।
- एक त्योहार के दौरान हुए विवाद के बाद कोवलन माधवी को छोड़ देता है।
- पश्चाताप में वह कन्नगी के पास लौटता है—और कन्नगी उसे पूर्ण क्षमा कर देती है।
निधन हो चुके धन के कारण दोनों नई शुरुआत के लिए मदुरै की ओर प्रस्थान करते हैं।
2. मदुरै कांड़ – अन्याय, सत्य और कन्नगी का क्रोध (पांड्य राज्य)
मदुरै में त्रासदी घटती है—
- कोवलन, कन्नगी की सोने की पायल (सिलंबु) बेचने जाता है।
- एक बेईमान सुनार उसे रानी की चुराई हुई पायल का चोर बता देता है।
- बिना जाँच-पड़ताल के, पांड्य राजा कोवलन को फाँसी का आदेश दे देता है।
यह सुनकर कन्नगी राजदरबार पहुँचती है:
- वह दूसरी पायल तोड़कर उसका मोती दिखाती है
— जिससे सिद्ध होता है कि पायल उन्हीं की है, चोरी की नहीं। - अपनी गलती समझकर राजा वहीं मर जाता है।
- रानी भी प्राण त्याग देती है।
कन्नगी क्रोधित होकर मदुरै को शाप देती है—
- वह अपना बायाँ स्तन तोड़कर शहर पर फेंकती है।
- एक दिव्य अग्नि पूरे शहर को भस्म कर देती है।
- केवल निर्दोष लोग बचते हैं—बच्चे, वृद्ध, साधु, ब्राह्मण, गायें और पवित्र महिलाएँ।
कन्नगी अब केवल स्त्री नहीं—न्याय की देवी बन जाती है।
3. वांची कांड़ – देवी कन्नगी की प्रतिष्ठा (चेरा राज्य)
कन्नगी की दिव्यता का समाचार चेरा राजा सेंगुट्टुवन तक पहुँचता है।
- वह हिमालय तक यात्रा कर एक पवित्र पत्थर लाता है।
- उसी से कन्नगी की पट्टिनी देवी की प्रतिमा बनायी जाती है।
- वांची में भव्य मंदिर का निर्माण होता है।
- कन्नगी को दक्षिण भारत भर में सतीत्व, सत्य और न्याय की देवी के रूप में पूजा जाता है।
मुख्य विषय – महाकाव्य की आत्मा
⭐ न्याय (धर्म) और सत्ता की जवाबदेही
यह महाकाव्य सिखाता है कि राजा भी कानून से ऊपर नहीं होता।
⭐ प्रेम, निष्ठा और क्षमा
कोवलन का भटकाव, कन्नगी की पवित्रता तथा माधवी का दर्द—तीनों मानवीय भावनाओं को गहराई से छूते हैं।
⭐ स्त्री-शक्ति और दिव्य क्रोध
कन्नगी का रूपांतरण—कोमल पत्नी से प्रजाज्ञानी देवता तक—स्त्री की शक्ति और साहस का कालजयी प्रतीक है।
⭐ कला, संस्कृति और समाज
नृत्य, संगीत, त्योहार, व्यापार, नगर-जीवन—यह महाकाव्य प्राचीन तमिल संस्कृति का खूबसूरत चित्र है।
सांस्कृतिक महत्व और आधुनिक प्रभाव
सिलप्पतिकारम् को अक्सर “तमिल का इलियड” कहा जाता है।
इसे 19वीं शताब्दी में यू.वी. स्वामिनाथ अय्यर ने पुनः खोजा और 1892 में प्रकाशित किया।
इसका प्रभाव—
- भरतनाट्यम नृत्य में कई प्रस्तुतियाँ
- फिल्में: कन्नगी (1942), पूंपुहार (1964)
- लोकपरंपराएँ: कन्नगी/पट्टिनी देवी की पूजा तमिलनाडु, केरल, श्रीलंका में
- साहित्य: अनेक अनुवाद और आधुनिक रूपांतरण
- रेलगाड़ी: सिलंबु एक्सप्रेस इसी पर आधारित है
आज के समय में सिलप्पतिकारम् क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यह कुछ शाश्वत प्रश्न उठाता है—
- क्या अन्याय का दंड अनिवार्य है?
- प्रेम की सीमा क्या है?
- क्या सत्य सत्ता पर विजय पा सकता है?
- एक सामान्य स्त्री देवी कैसे बन जाती है?
कन्नगी का संदेश अमर है—
सत्य में अपार शक्ति है, और अन्याय अंततः स्वयं जल जाता है।