कश्मीर में नाग और हिंदू धर्म: एक अखंड पवित्र संबंध

Sanjay Bajpai
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हिमाच्छादित पर्वतों, निर्मल झरनों और प्राचीन नदियों से घिरी कश्मीर घाटी केवल प्राकृतिक सौंदर्य का ही नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक परंपरा का भी केंद्र रही है। इस भूमि और इसके दिव्य रक्षकों—नागों—के बीच एक अटूट पवित्र संबंध है। नाग न तो बाहरी तत्व हैं और न ही किसी पूर्व-हिंदू परंपरा के अवशेष; वे हिंदू धर्म की सनातन ब्रह्मांडीय व्यवस्था में पूर्णतः अंतर्निहित दिव्य सत्ता हैं। कश्मीर में नाग जल, उर्वरता और धर्म के शाश्वत संरक्षक माने गए हैं।






कश्मीर के आदिम संरक्षक: नाग


कश्मीर का सबसे प्राचीन धार्मिक ग्रंथ नीलमत पुराण (लगभग 6वीं–8वीं शताब्दी ई.) कश्मीर की उत्पत्ति की कथा प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार, कश्मीर कभी सतीसर नामक विशाल झील था, जिसमें नागों का वास था।

इन नागों के राजा थे नील नाग, जो ऋषि कश्यप के पुत्र और भगवान विष्णु के वरदान से इस क्षेत्र के जलों के अधिपति बने।


मानव बसावट तभी संभव हुई जब झील का जल निकाला गया—और यह कार्य नागों की स्वीकृति से हुआ। यही स्वीकृति कश्मीर में धर्मसंगत मानव जीवन की नींव बनी।

नीलमत पुराण में नाग-पूजा को धर्म, त्योहारों, और नैतिक व्यवस्था का अभिन्न अंग बताया गया है। यहाँ नाग किसी “गैर-हिंदू” परंपरा का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि क्षेत्रपाल देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं।



हिंदू ब्रह्मांड में नागों का स्थान


हिंदू धर्म में नाग सदैव दिव्य या अर्ध-दिव्य सत्ता रहे हैं—धर्म से अलग नहीं, बल्कि उसके केंद्र में:


भगवान विष्णु अनंत शेष पर शयन करते हैं—जो सृष्टि की अनंतता और संरक्षण का प्रतीक हैं।

📷 चित्र: क्षीरसागर में अनंत शेष पर विराजमान भगवान विष्णु


भगवान शिव अपने कंठ में वासुकी नाग धारण करते हैं—जो कुंडलिनी शक्ति, प्राण और काल पर नियंत्रण का प्रतीक है।




कश्मीर की शैव-वैष्णव परंपरा में भी यही भाव है। नीलमत पुराण में नागों को भैरवों और देवियों के साथ पवित्र स्थलों के रक्षक के रूप में स्थापित किया गया है।


ऋषि कश्यप: सृष्टि के महान जनक


पुराणों के अनुसार, ऋषि कश्यप देवता, असुर, मनुष्य और नाग—सभी के आदि पिता हैं।

कश्मीर की परंपरा में, उनकी पत्नी कद्रू से नागों की उत्पत्ति मानी जाती है और नील नाग को कश्मीर का प्रमुख संरक्षक माना गया है।


यह वंशावली यह स्पष्ट करती है कि नाग और देवता एक ही धार्मिक परिवार का हिस्सा हैं। कश्मीरी हिंदू स्वयं को नागों का वंशज नहीं मानते, बल्कि उन्हें दिव्य संरक्षक के रूप में सम्मान देते हैं।

भूमि स्वयं साक्षी है: कश्मीर का नाग-भूगोल


कश्मीर की पवित्र भौगोलिक संरचना नाग-पूजा की सजीव साक्षी है। “-नाग” पर समाप्त होने वाले स्थान आज भी पूज्य हैं:


अनंतनाग – अनंत नाग का धाम


वेरिनाग – नील नाग से जुड़ा तीर्थ


कोकरनाग, शेषनाग, नीलनाग आदि



ये सभी स्थान पवित्र जलस्रोत हैं, जहाँ आज भी श्रद्धा के साथ पूजा होती है। यहाँ तक कि मुगल शासकों ने भी इन स्थलों की पवित्रता स्वीकार करते हुए उद्यानों का निर्माण किया।





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कश्मीरी पंडितों की जीवित परंपरा


कश्मीर के मूल निवासी कश्मीरी पंडित आज भी नागों का सम्मान करते हैं:


पवित्र झरनों पर दूध, पुष्प, दीप और जल अर्पण


स्थानीय क्षेत्र देवताओं की पूजा


शैव परंपरा में शिव–भैरव–नाग की त्रयी का पूजन





यह पूजा किसी पूर्वज-पूजा का दावा नहीं, बल्कि भूमि के दिव्य रक्षकों के प्रति कृतज्ञता है।



एक शाश्वत संबंध


कश्मीर में नागों और हिंदू धर्म का संबंध अखंड है—राज्यों के उत्थान-पतन से परे, इतिहास की आँधियों से अडिग। बहते झरनों, गूंजते पर्वतों और जीवित परंपराओं में यह आज भी विद्यमान है।


कश्मीर को समझना है, तो उसके नागों को समझना होगा—क्योंकि वे इस भूमि की आत्मा हैं।

और नागों का सम्मान करना, वस्तुतः सनातन धर्म की सृष्टि-संहार-संतुलन की दिव्य व्यवस्था का सम्मान करना है।

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