क्या विज्ञान धर्म को समझा सकता है?
विज्ञान और धर्म के बीच बहस प्रायः इस प्रश्न पर केंद्रित रही है कि ये दोनों मानव अनुभव को समझने में किस प्रकार योगदान देते हैं। परंतु यह लेख एक भिन्न प्रश्न उठाता है — क्या विज्ञान स्वयं धर्म की व्याख्या कर सकता है?
धर्म की व्याख्या: एक नया दृष्टिकोण
यहाँ प्रश्न धर्म की सत्यता का नहीं, बल्कि यह समझने का है कि धार्मिक विचार और आचरण मनुष्य में उत्पन्न कैसे हुए, वे समाज में फैले कैसे, और मानव जीवन में उनकी भूमिका क्या रही।
अतीत के प्रयास और उनकी सीमाएँ
मानवविज्ञान, दर्शन और धर्मशास्त्र ने धर्म की व्याख्या के अनेक प्रयास किए, परंतु अधिकांश सिद्धांत किसी आदर्श या सीमित रूप को समझाने तक ही सीमित रहे।
आधुनिक विज्ञान क्या नया कहता है?
पिछले कुछ दशकों में संज्ञानात्मक विज्ञान, विकासवादी मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान ने मानव मस्तिष्क के कार्य-तंत्र को बेहतर ढंग से समझाया है।
- कारण खोजने की प्रवृत्ति
- अदृश्य शक्तियों की कल्पना
- सामाजिक नियमों से एकता
- मृत्यु और अनिश्चितता से अर्थ की खोज
यही मानसिक प्रवृत्तियाँ धर्म को जन्म देती हैं और उसे स्थायी बनाती हैं।
धर्म जैसा है, वैसा क्यों है?
लगभग हर संस्कृति में धर्म के समान तत्व मिलते हैं — देवता, नैतिक नियम, अनुष्ठान और परलोक की अवधारणा। यह संयोग नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क की संरचना का परिणाम है।
निष्कर्ष
विज्ञान का उद्देश्य धर्म को नकारना नहीं, बल्कि उसे एक मानवीय अनुभव के रूप में समझना है। धर्म की वैज्ञानिक व्याख्या हमें स्वयं मनुष्य को बेहतर समझने में सहायता करती है।