विज्ञान और धर्म: मानव समझ के पूरक क्षेत्र
“मनुष्य ही खगोलशास्त्री है।” — फ्रिट्ज़ बूरी
सिकुड़ता हुआ ब्रह्मांड — और विस्तारित होती मानव चेतना
जब खगोलशास्त्री जेरार्द दे वॉकूलर ने मानवता को एक नगण्य ग्रह पर स्थित एक अत्यंत सूक्ष्म बिंदु के रूप में वर्णित किया—जो एक साधारण तारे के चारों ओर, आकाशगंगा की एक छोटी-सी भुजा में घूम रहा है—तो वे आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान की सामान्य भावना को व्यक्त कर रहे थे। ब्रह्मांड अत्यंत विशाल है; हम भौतिक रूप से बहुत छोटे हैं।
परंतु बासेल के धर्मशास्त्री फ्रिट्ज़ बूरी ने इसका एक गहरा उत्तर दिया—
“मनुष्य ही खगोलशास्त्री है।”
इस एक वाक्य में उन्होंने दृष्टि को ब्रह्मांडीय पैमाने से हटाकर मानवीय अर्थ की ओर मोड़ दिया। ब्रह्मांड हमें आकार में छोटा कर सकता है, किंतु उसी ब्रह्मांड को मापने, समझने और अर्थ देने वाला मानव चेतना ही है।
यह उत्तर हमें एक महत्वपूर्ण किंतु अक्सर भूली हुई सच्चाई की याद दिलाता है—
विज्ञान का भी एक मानवीय चेहरा होता है।
हर ब्रह्मांडीय सिद्धांत, हर समीकरण और हर दूरबीन से ली गई छवि मानव मस्तिष्क की रचना है—अनंत वास्तविकता को सीमित बुद्धि से समझने का प्रयास।
विज्ञान और धर्म: मानवीय रचनाएँ, भिन्न उद्देश्य
यदि वैज्ञानिक सिद्धांत मानवीय निर्माण हैं, तो कई दार्शनिक यह भी मानते हैं कि धार्मिक प्रतीक और अवधारणाएँ भी मानवीय अनुभवों से ही जन्म लेती हैं। इससे न तो विज्ञान का महत्व घटता है और न ही धर्म का—बल्कि दोनों की प्रकृति अधिक स्पष्ट होती है।
विज्ञान अवलोकन, प्रयोग और गणितीय विवरण के माध्यम से व्याख्या करता है।
धर्म प्रतीकों, कथाओं, नैतिक दृष्टि और अस्तित्वगत अनुभूति के माध्यम से अर्थ खोजता है।
दोनों की उत्पत्ति एक ही स्रोत से होती है—
मानव जिज्ञासा और सत्य की खोज से।
असली प्रश्न यह नहीं है कि विज्ञान और धर्म टकराते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उनकी सीमाएँ और क्षेत्र कैसे परस्पर जुड़ते हैं।
व्हाइटहेड की स्थायी चेतावनी
विज्ञान-दर्शन के अग्रणी विचारक अल्फ्रेड नॉर्थ व्हाइटहेड ने प्रसिद्ध रूप से कहा था:
“विज्ञान और धर्म मानवता को प्रभावित करने वाली दो सबसे शक्तिशाली शक्तियाँ हैं।”
उन्होंने आगे एक गंभीर चेतावनी भी दी:
“इतिहास की भविष्य की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि यह पीढ़ी विज्ञान और धर्म के संबंध को कैसे समझती है।”
व्हाइटहेड ने विज्ञान और धर्म के ऐतिहासिक संबंध का कोई कठोर मॉडल नहीं दिया, बल्कि उन्होंने एक अधिक मूलभूत बात पर ज़ोर दिया—
प्रामाणिक विज्ञान और छद्म-विज्ञान में अंतर
सजग धर्म और अंधविश्वास में अंतर
समस्या विज्ञान या धर्म के अस्तित्व में नहीं है, बल्कि इस तथ्य में है कि उन्हें अक्सर गलत समझा या गलत ढंग से प्रयोग किया जाता है।
संघर्ष से आगे: “डोमेन” दृष्टिकोण
व्हाइटहेड के बाद अनेक विचारकों ने विज्ञान और धर्म के संबंध को समझाने के लिए विभिन्न ढाँचे प्रस्तुत किए। इनमें से एक प्रभावशाली दृष्टिकोण है—डोमेन सिद्धांत।
इस सिद्धांत का मूल प्रश्न सरल किंतु गहरा है:
क्या विज्ञान और धर्म वास्तविकता के एक ही क्षेत्र (डोमेन) की बात करते हैं, या अलग-अलग क्षेत्रों की?
इस प्रश्न से कई संभावनाएँ जन्म लेती हैं।
1. एक ही डोमेन, समान दावे
इस दृष्टिकोण में विज्ञान और धर्म एक ही वास्तविकता को एक ही ढंग से समझाने का दावा करते हैं। ऐतिहासिक रूप से यह स्थिति अक्सर टकराव में बदल जाती है, क्योंकि वैज्ञानिक पद्धति और धार्मिक भाषा की प्रकृति भिन्न होती है। किसी भी पक्ष का अतिशय शाब्दिक आग्रह तनाव पैदा करता है।
2. एक ही डोमेन, भिन्न व्याख्याएँ
यहाँ विज्ञान और धर्म एक ही वास्तविकता के पहलुओं पर बात करते हैं, किंतु उनकी व्याख्याएँ अलग होती हैं। ये व्याख्याएँ:
संघर्षपूर्ण हो सकती हैं, जब कोई एक पूर्ण अधिकार का दावा करे
या पूरक हो सकती हैं, जब दोनों अपनी-अपनी सीमाओं में अंतर्दृष्टि दें
सृजन, चेतना और मानव उत्पत्ति से जुड़े अनेक आधुनिक विवाद इसी क्षेत्र में आते हैं।
3. भिन्न डोमेन
डोमेन सिद्धांत का सबसे प्रभावशाली निष्कर्ष यह है कि:
विज्ञान पूछता है — ब्रह्मांड कैसे काम करता है
धर्म पूछता है — अस्तित्व का अर्थ क्या है
इस दृष्टि से विज्ञान और धर्म परस्पर विरोधी नहीं रहते, भले ही दोनों कभी-कभी अधूरे या त्रुटिपूर्ण हों। वे वास्तविकता को समझने के दो अलग-अलग स्तरों पर केंद्रित दो लेंसों की तरह हैं।
प्रतिस्पर्धा नहीं, पूरकता
पूरकता की अवधारणा यह बताती है कि विज्ञान और धर्म बौद्धिक क्षेत्र के प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं, बल्कि मानव अनुभव के अलग-अलग आयामों को संबोधित करने वाले सहयोगी हैं।
विज्ञान भविष्यवाणी, नियंत्रण और तकनीकी प्रगति में सक्षम है।
धर्म नैतिक दिशा, उद्देश्य और आशा प्रदान करता है।
एक दूरबीन हमें यह बता सकती है कि तारे कैसे जन्म लेते हैं, लेकिन यह नहीं बता सकती कि उन्हें देखकर हमें सौंदर्य क्यों महसूस होता है। एक भजन हमें विस्मय से भर सकता है, लेकिन वह तारों का द्रव्यमान नहीं माप सकता। दोनों शक्तिशाली हैं—क्योंकि दोनों वही करते हैं जो दूसरा नहीं कर सकता।
ज्ञान का मानवीय चेहरा
बूरी का कथन—“मनुष्य ही खगोलशास्त्री है”—हमें मूल बिंदु पर लौटाता है। चाहे हम समीकरणों में बात करें या प्रतीकों में, सारा ज्ञान मानवीय मस्तिष्क, संस्कृति और इतिहास के माध्यम से ही आता है।
इस सच्चाई को स्वीकार करना सत्य को कमजोर नहीं करता—बल्कि उसे मानवीय बनाता है। यह विज्ञान को अर्थ के प्रति विनम्र और धर्म को यांत्रिकी के प्रति विनम्र बनाता है।
भविष्य को आकार देने वाला विकल्प
व्हाइटहेड की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। यदि विज्ञान केवल मापन तक सीमित होकर अर्थ को नकार दे, तो वह निर्धन हो जाता है। यदि धर्म तर्क और प्रमाण को त्याग दे, तो वह खतरनाक बन जाता है।
लेकिन जब प्रामाणिक विज्ञान और सजग धर्म अपने-अपने डोमेन का सम्मान करते हुए संवाद करते हैं, तो वे मानव सभ्यता को समृद्ध करते हैं।
भविष्य विज्ञान या धर्म में से किसी एक को चुनने से नहीं बनेगा—
बल्कि इस समझ से बनेगा कि दोनों को अपनी-अपनी भाषा में, मानव समझ की साझा खोज में बोलने दिया जाए।
इतने विशाल ब्रह्मांड में सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह नहीं कि हम कितने छोटे हैं—बल्कि यह है कि हम यह प्रश्न पूछ सकते हैं कि इसका अर्थ क्या है।
