मकर संक्रांति और पोंगल: कर्मयोग, कृषि और करुणा
का आध्यात्मिक महापर्व
सर्वोच्च प्रभु को सादर प्रणाम—उस आद्य शक्ति
को नमन, जिसने वर्ष को ऋतुओं में विभक्त किया। सूर्यदेव को वंदन, जो इस पावन दिवस पर
अपनी उत्तरायण यात्रा का शुभारंभ करते हैं। मकर संक्रांति केवल खगोलीय परिवर्तन नहीं,
बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का उत्सव है।
शंक्रमण और मकर संक्रांति का अर्थ
संस्कृत शब्द शंक्रमण का अर्थ है—गति का आरंभ।
जिस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर बढ़ते हैं, वही दिन मकर संक्रांति कहलाता
है। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में, यही पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है और
कई समुदायों में इसे नववर्ष का प्रारंभ माना जाता है।
पोंगल: कृतज्ञता और कर्मयोग का उत्सव
पोंगल कृषि से जुड़ा पर्व है। किसान अपनी पहली
फसल ईश्वर को अर्पित करता है—यही पोंगल का मूल भाव है। कर्म करना मनुष्य का दायित्व
है, पर फल ईश्वर को समर्पित करना कर्मयोग की सच्ची भावना है।
इस अवसर पर सेवक, श्रमिक और निर्धन वर्ग को
अन्न, वस्त्र और धन दिया जाता है। अगले दिन गाय—जिसे पवित्र माता का प्रतीक माना जाता
है—की पूजा होती है तथा पक्षियों और पशुओं को भोजन कराया जाता है।
हृदय का विस्तार और जीव-जगत के प्रति करुणा
इन उत्सवों के माध्यम से भक्त का हृदय क्रमशः
विस्तृत होता है—परिवार से समाज तक और समाज से समस्त जीव-जगत तक। अनजाने ही मनुष्य
का हृदय इतना विशाल हो जाता है कि सम्पूर्ण सृष्टि उसमें समा जाए।
पितृ-तर्पण और आध्यात्मिक महत्व
मकर संक्रांति से नए मास का आरंभ होता है। इस
दिन पितरों को तर्पण दिया जाता है। आध्यात्मिक साधकों के लिए उत्तरायण का काल विशेष
शुभ माना गया है। कहा जाता है कि इसी काल में गुरु शिष्य पर विशेष कृपा करते हैं।
भीष्म पितामह और उत्तरायण
महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह ने शरशय्या
पर उत्तरायण की प्रतीक्षा कर देह त्याग किया। यह घटना इस पर्व के आध्यात्मिक महत्व
को और भी गहरा कर देती है।
मट्टू पोंगल और पशुधन का सम्मान
पोंगल के अगले दिन मट्टू पोंगल मनाया जाता है।
इस दिन गाय-बैलों को सजाया जाता है, पूजा की जाती है और कुछ क्षेत्रों में पारंपरिक
वीरता-प्रदर्शन भी होते हैं।
साझेदारी और सच्ची संपदा
इन दिनों यात्रा को अशुभ माना जाता है ताकि
परिवार एकत्र रहे। यह पर्व सिखाता है कि सच्ची संपदा धन नहीं, बल्कि रिश्ते, भूमि,
पशुधन और प्रकृति के साथ हमारा सामंजस्य है।
निष्कर्ष
मकर संक्रांति और पोंगल हमें कृतज्ञता, करुणा
और कर्मयोग का संदेश देते हैं। जब हम इन्हें इस भाव से मनाते हैं, तो जीवन के मूल मूल्य
स्वयं उजागर हो जाते हैं।
लेखक: संजय बाजपेई
