भारत कृषि प्रधान देश है और यहाँ ऋतु परिवर्तन, फसल कटाई तथा सूर्य उपासना से जुड़े पर्वों का विशेष महत्व है। मकर संक्रांति और पोंगल ऐसा ही एक प्रमुख पर्व है, जो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का संकेत देता है। यही कारण है कि यह पर्व पूरे देश में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
मकर संक्रांति और पोंगल का महत्व
- सूर्य उत्तरायण होता है
- नई फसल के स्वागत का पर्व
- दान, पुण्य, स्नान और उत्सव का समय
- कृषि, प्रकृति और जीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव
भारत के विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति / पोंगल के नाम
🔸 तमिलनाडु
पोंगल
- भोगी पोंगल
- सूर्य पोंगल
- मट्टू पोंगल
- कानूम पोंगल
🔸 आंध्र प्रदेश & तेलंगाना
संक्रांति
- भोगी
- कनुमा
- मुक्कनुमा
🔸 कर्नाटक
मकर संक्रांति / सुग्गी
🔸 केरल
मकर संक्रांति / मकरविलक्कु
(सबरीमाला में विशेष महत्व)
🔸 महाराष्ट्र
मकर संक्रांत
- तिलगुल परंपरा
- “तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला”
🔸 गुजरात
उत्तरायण
- अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव
🔸 राजस्थान
मकर संक्रांति / उत्तरायण
🔸 पंजाब
माघी
🔸 हरियाणा & हिमाचल प्रदेश
माघी / मकर संक्रांति
🔸 उत्तर प्रदेश
खिचड़ी पर्व / मकर संक्रांति
- प्रयागराज में खिचड़ी दान
🔸 बिहार & झारखंड
तिल संक्रांति / खिचड़ी पर्व
🔸 पश्चिम बंगाल
पौष संक्रांति
- गंगासागर मेला
🔸 ओडिशा
मकर संक्रांति / मकर चौला
🔸 असम
माघ बिहू (भोगाली बिहू)
🔸 उत्तराखंड
उत्तरायणी / घुघुतिया
🔸 कश्मीर
शिशुर सैंक्रात
सांस्कृतिक एकता का पर्व
नाम और परंपराएँ भले ही अलग हों, लेकिन संदेश एक ही है—
प्रकृति के प्रति आभार, सूर्य की उपासना और सामाजिक समरसता।
यही मकर संक्रांति और पोंगल को पूरे भारत को जोड़ने वाला पर्व बनाता है।
निष्कर्ष
मकर संक्रांति और पोंगल केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की विविधता और एकता का प्रतीक हैं। यह पर्व हमें प्रकृति, कृषि और जीवन मूल्यों से जोड़ता है।
✍️ लेखक: संजय बाजपेई
