भरतनाट्यम: भारत की प्राचीन नृत्य शैली
भरतनाट्यम भारत की सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक है। इसकी उत्पत्ति दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु के मंदिरों और राजदरबारों में हुई थी। यह नृत्य मुख्यतः भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम रहा है।
इतिहास और उत्पत्ति
भरतनाट्यम का ऐतिहासिक प्रमाण चिदंबरम मंदिर के प्रवेश द्वार पर उकेरी गई 108 मुद्राओं में मिलता है। 19वीं शताब्दी में इस नृत्य को व्यवस्थित रूप देने का श्रेय तंजावुर की तंजौर चौकड़ी (चार भाइयों) को जाता है।
देवदासी परंपरा और सामाजिक बदलाव
यह नृत्य प्राचीनकाल में देवदासी प्रणाली के अंतर्गत विकसित हुआ, जिसमें महिलाएँ ईश्वर की सेवा में नृत्य व संगीत के माध्यम से संलग्न होती थीं। लेकिन कालांतर में इस परंपरा को सामाजिक रूप से नकारात्मक दृष्टि से देखा जाने लगा।
20वीं सदी में पुनरुद्धार
ई. कृष्णा अय्यर और रुक्मिणी देवी अरुंडेल जैसे सांस्कृतिक पुनरुद्धारकों ने इस कला को मंदिरों से रंगमंच तक पहुँचाया।
नृत्य की शैली और तत्व
इस नृत्य में शरीर की एक विशेष मूल मुद्रा होती है, जिसमें नर्तकी घुटनों के बल नीचे झुकती है और लय के साथ पैरों की चाल होती है। हस्त मुद्राएँ और मुखाभिनय के द्वारा नृत्य कथा का संप्रेषण करती हैं।
प्रमुख कथाएँ और भक्ति भाव
प्रस्तुतियाँ प्रायः भगवान शिव, विष्णु, राम, कृष्ण और उनके परिवार से जुड़ी होती हैं। यह नृत्यभक्ति का रूप है।
समकालीन भरतनाट्यम
आज भरतनाट्यम भारत की सबसे लोकप्रिय शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक है। यह पुरुष और महिला दोनों द्वारा अभ्यास किया जाता है, और देश के कई विश्वविद्यालयों में इसके पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं।
प्रमुख भरतनाट्यम नर्तक
- बालासरस्वती – अंतिम देवदासी कही जाती हैं।
- रुक्मिणी देवी अरुंडेल – जिन्होंने इसे सांस्कृतिक मंच पर पुनर्जीवित किया।
- यामिनी कृष्णमूर्ति – प्रसिद्ध मंच कलाकार।
भरतनाट्यम आज भी भारतीय संस्कृति की आत्मा को स्पंदित करता है – यह केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि भक्ति की लयबद्ध अभिव्यक्ति है।
