भारतीय ज्ञानमीमांसा और प्रमाण का तात्त्विक विवेचन
मुक्ति को ज्ञान और समझ के साथ जोड़ने के सदियों पुराने भारतीय समीकरण ने बहुत पहले ही ज्ञानमीमांसा के प्रश्नों को जन्म दिया, विशेष रूप से सत्य के प्रमाणों के मानदंड (प्रमाण) को परिभाषित करने के प्रयास को।
हिंदुओं ने अपनी परंपरा को वेद पर आधारित करते हुए, श्रुति को 'सत्य' और वैदिक प्रस्तावों को प्रमाण-ग्रंथ के रूप में स्वीकार किया।
मीमांसकों, जिन्होंने केवल आदेशों (विधि) को 'प्रकट' माना, और वेदांतियों, जिनके लिए वेद का उद्देश्य परम ज्ञान (विद्या) था, के बीच प्रारंभिक काल में ही विवाद उत्पन्न हुआ।
गैर-वैदिक प्रणालियों—जैसे कि बौद्ध और जैन धर्म—के विभिन्न संप्रदायों के साथ वाद-विवाद में, हिंदुओं ने अपनी स्वयं की ज्ञानमीमांसा विकसित की।
न्याय दर्शन ने विशेष रूप से तर्क और प्रमाण की प्रक्रिया की विस्तृत समीक्षा की और उसे व्यवस्थित किया।
मुख्य प्रमाण (Pramāṇa) प्रणाली:
- प्रत्यक्ष (Perception)
- अनुमान (Inference)
- उपमान (Comparison/Analogy)
- शब्द (Verbal testimony – जैसे वेद)
- अर्थापत्ति (Postulation – Logical necessity)
- अभाव (Non-existence – Absence as a proof)
प्रारंभिक मध्यकाल से ही हिंदू विद्वानों की यह परंपरा बन गई थी कि वे अपनी कृतियों की शुरुआत में ही यह स्पष्ट करते थे कि वे कौन-कौन से प्रमाण स्वीकार करते हैं।
इस प्रकार भारतीय दर्शन में ज्ञान का स्रोत केवल प्रत्यक्ष या तर्क नहीं रहा, बल्कि शब्द (वेद), सादृश्य और व्युत्पन्न निष्कर्षों पर भी गंभीर विमर्श हुआ।
यह बहुलतावादी प्रमाण-व्यवस्था भारतीय बौद्धिक परंपरा की गहराई और विविधता को दर्शाती है।
