🌌 धर्म: ब्रह्मांडीय और सामाजिक व्यवस्था का सनातन स्वरूप
धर्म केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि एक ब्रह्मांडीय और सामाजिक व्यवस्था है, जिसे हिंदू धर्म सनातन धर्म के रूप में जानता है। यह संपूर्ण जीवन शैली, व्यवहार और चेतना को मार्गदर्शित करता है।
श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं:
“धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।”
जब भी अधर्म बढ़ता है, तब धर्म की पुनः स्थापना हेतु मैं जन्म लेता हूँ।
“धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।”
जब भी अधर्म बढ़ता है, तब धर्म की पुनः स्थापना हेतु मैं जन्म लेता हूँ।
🧘♂️ धर्म के दो स्वरूप
- सामान्य धर्म: सभी के लिए लागू – धैर्य (धृति), क्षमा, दान, सत्य, इंद्रिय निग्रह, अक्रोध आदि।
- विशेष धर्म: वर्णाश्रम (जाति और जीवन अवस्था) आधारित नियम, जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के कर्तव्य।
📚 धर्म के स्रोत
- वेद – ज्ञान का प्राचीनतम स्रोत
- मनुस्मृति – सामाजिक और नैतिक संहिताएँ
- परंपरा – क्षेत्रीय और सांस्कृतिक परंपराएँ
- आत्मातुष्टि – अंतरात्मा की स्वीकृति
🔱 धार्मिक समुदायों के नियम
जैसे वैष्णव धर्म के अनुयायियों के लिए पूजा-पद्धति, व्रत, वस्त्र और आहार के विशिष्ट नियम होते हैं। यह सब धर्म का ही हिस्सा हैं।
🕉️ धर्म और आधुनिकता
आज के समय में, कुछ लोग धर्म को आधुनिक दृष्टिकोण से देखने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि कुछ इसे भारत में हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़कर देखते हैं। परंतु सनातन धर्म का मूल सदैव शाश्वत और सार्वकालिक रहा है।