कामदेव, संध्या और अरुंधति की उत्पत्ति – शिव पुराण की गूढ़ कथा
शिव पुराण में वर्णित इस दिव्य कथा की शुरुआत होती है ब्रह्मा से, जिन्होंने सप्तर्षियों की रचना के बाद एक स्त्री रूप की उत्पत्ति की – संध्या। संध्या का अर्थ है "गोधूलि", क्योंकि वह उस समय प्रकट हुई जब दिन और रात मिलते हैं। उनका सौंदर्य इतना मोहक था कि ब्रह्मा सहित सभी ऋषि भावनात्मक रूप से प्रभावित हो गए।
कामदेव का प्राकट्य
ब्रह्मा के प्रेम से व्याकुल मन से एक और सुंदर प्राणी उत्पन्न हुआ – काम, जिन्हें मन्मथ भी कहा गया। उन्हें पाँच पुष्प बाण दिए गए: संतोष, आकर्षण, मोह, म्लानता और संहार।
कामदेव का परीक्षण और संध्या का प्रभाव
कामदेव ने अपनी शक्ति का परीक्षण किया और सबको मोहित कर दिया। यहाँ तक कि संध्या भी इस मोह से ग्रसित हो गईं। यह देखकर ब्रह्मा को ग्लानि हुई और उन्होंने शिव से प्रार्थना की। भगवान शिव प्रकट हुए और ब्रह्मा को अपनी पुत्री के प्रति उत्पन्न काम भाव के लिए फटकारा।
काम को श्राप और रति से विवाह
ब्रह्मा ने कामदेव को श्राप दिया कि एक दिन वह भगवान शिव पर बाण चलाएगा और उसका दंड मिलेगा। बाद में उन्होंने उन्हें रति से विवाह करने का वरदान दिया, जो दक्ष की पुत्री थीं।
संध्या का प्रायश्चित और अरुंधति का पुनर्जन्म
संध्या ने अपने कृत्यों पर पश्चाताप किया और हिमालय में तपस्या करने चली गईं। ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें शिव उपासना सिखाई। शिव ने उन्हें अग्नि में शरीर त्यागने का आदेश दिया और पुनर्जन्म में ऋषि मेदातिथि की पुत्री बनने का आशीर्वाद दिया।
अग्नि यज्ञ में उनका शरीर स्वर्ग में दो भागों में विभाजित हो गया – प्रातः संध्या और सायं संध्या।
अरुंधति का पुनर्जन्म और विवाह
ऋषि मेदातिथि को अग्नि में एक कन्या मिली, जिसका नाम अरुंधति रखा गया। वह ऋषि वशिष्ठ से विवाह कर परम पवित्र और आदर्श पत्नी बनीं। आज भी उन्हें संध्या तारे के रूप में जाना जाता है।
💡 निष्कर्ष
यह कथा न केवल काम और की द्वंद्वात्मकता को दर्शाती है, बल्कि तपस्या और आत्मशुद्धि की शक्ति को भी उजागर करती है। शिव पुराण में वर्णित यह कथा अध्यात्म, प्रेम और मोक्ष की ओर प्रेरित करती है।
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